Monday, August 17, 2009

जिन्ना के अनुयायी

बड़ी-बड़ी बातें करते थे
ये कैसे भाजपायी निकले
सावरकर की बात छेड़कर
जिन्ना के अनुयायी निकले।
(यह कविता विस्तार से पढ़ने के लिए इस ब्लॉग पर जाएं-

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Wednesday, August 5, 2009

धरती से जीवन किस ग्रह से आया

धरती पर जीवन किस ग्रह से आया इसके संकेत हमारे वेद और पुराण में मिलते हैं। सृष्टि के निर्माण की कथाएं हालांकि काफी समय बाद कलमबद्ध हुईं मगर इनमें संकेत हैं, जो कई रहस्य खोलते हैं। इस संबंध में विस्तार से पढ़े-

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Tuesday, August 4, 2009

तीन पग में विष्णु ने कैसे नापी धरती

कहा जाता है कि भगवान विष्णु ने तीन पग में यह धरती नापी थी। ऋग्वेद में यह संकेत इस तरह मिलता है कि भगवान विष्णु तीन चरण में यह धरती बसाई। इस संबंध में विस्तार से पढ़ें -
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Sunday, August 2, 2009

क्या धरती पर जीवन बसाने के दो अलग-अलग मिशन थे

-सुधीर राघव
हालंकि चारों वेदों से भी इसके पर्याप्त संकेत मिलते हैं कि जीवन किसी अन्य ग्रह से आया मगर यहां हमने चर्चा पुराणों से शुरू की है। क्या धरती पर जीवन बसाने को दो अलग-अलग मिशन थे और दोनों में प्रतिद्वंद्वता थी। इस संबंध में विस्तार से पढ़ें-
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Saturday, August 1, 2009

चंद्रमोहन नहीं चांदग्रहणमोहन कहिए

रुलीराम बिश्‍नोई
लो जी चांद मोहम्‍मद वापस चंद्रमोहन हो गए हैं। हिन्‍दू धर्म और बिश्‍नोई संप्रदाय उन्‍हें प्रिय लगने लगे हैं। वैसे फिजा को तलाक देने के बाद चांदमोहम्‍मद को उस पर दोबारा से ऐसे ही प्‍यार आया था और वे अधनंगे ही उनके पैरों में नाक रगडते नजर आए। चार दिन में फिर उनका फिजा से मन भरा और जनाब अब चल दिए बिश्‍नोई बनने। अब वो कसमें खा रहे हैं कि वे कभी बिश्‍नोई नियमों के विरुद़ध कोई काम नहीं करेंगे। वैसे लाख टके का सवाल यह है कि बिश्‍नोई संप्रदाय के 29 नियमों में ऐसा कौन सा नियम है जिसका पालन आज तक चंद्रमोहन ने किया है। कहा जा रहा है कि बिश्‍नोई समाज ने उन्‍हें माफ कर दिया। कोई यह तो बताए कि किस पंचायत में समाज ने उन्‍हें माफी दी। अपनी पहली पत्‍नी सीमा के साथ जो अन्‍याय चंद्रमोहन ने किया है, उसकी माफी बिश्‍नोई सम्‍प्रदाय में नहीं है। अब तो वह फिजा का भी गुनहगार है, इसलिए उसे माफी का तो सवाल ही नहीं उठता। मुकाम के आचार्य रामानंद, जिन्‍होंने चांद मोहम्‍मद को चंद्रमोहन बनाया है, उनको 80 प्रतिशत बिश्‍नोई तो जानते ही नहीं। ऐसे में उनके पास समाज के अपराधी को माफी देने का अधिकार नहीं है। रामानंद जी ये तो बताएं की चंद्रमोहन के पाप तो उन्‍होंने धो दिए लेकिन चंद्रमोहन की पूर्व पत्‍नी सीमा बिश्‍नोई को न्‍याय दिलाने के लिए आपने क्‍या किया। चंद्रमोहन को मिली 100 क्विंटल दाना पक्षियों को चुगाने की सजा से पक्षियों का भला हो जाएगा, माना कि चंद्रमोहन के पाप धुल जाएंगे। सीमा को इससे क्‍या हासिल हुआ। क्‍या इससे उसकी जिंदगी में खुशियों लौट आएंगी। अगर धर्म और समाज के ठेकेदार सीमा को उसका खोया सम्‍मान और खुशियां नहीं दिला सकते तो उनके पास न तो चांद मोहम्‍मद को दोबारा बिश्‍नोई बनाने का अधिकार है और न ही उसको माफी देने का।
वैसे रामानंद जैसे बिश्‍नोई समाज के तथाकथित धर्मगुरुओं का यह बताना चाहिए कि वे तब कहां थे जब मीरा नाम की एक मुस्लिम लडकी को गुरु जंभेश्‍वर के मंदिर में प्रवेश करने से ही रोक दिया गया था। गुरु जंभेश्‍वर के नियमों से प्रभावित मीरा बिश्‍नोई समाज पर शोध कर रही थी और शोध के सिलसिले में ही वह मंदिरों के दर्शन कर रही थी। समाज के कुछ प्रबुद़ध लोगों के हस्‍तक्षेप से ही मीरा को बिश्‍नोई मंदिरों में जाने का हक मिला। अगर तब कोई मुस्‍लमान समाज के लिए अछूत था तो अब ऐसा क्‍या हुआ कि ये आचार्य आज एक ऐसे मुस्लिम को बिश्‍नोई समाज का आदरणीय व्‍यक्ति बना रहे हैं, जो पापी है। जिसने दो महिलाओं की जिंदगी बर्बाद की है। और रही बात बिश्‍नोई सभा हिसार की तो सब जानते हैं कि ये सभा बिश्‍नोइयों के हितों से ज्‍यादा भजन परिवार के स्‍वार्थ के लिए काम करती है। बिश्‍नोई समाज में इसके निर्णयों की कोई अहमियत प्राप्‍त नहीं है। सभा के किसी पदाधिकारी ने चंद्रमोहन के इस्‍लाम धर्म अपनाने का खुला विरोध नहीं किया था। जब भजनलाल ने चांद मोहम्‍मद को बेदखल किया इसके बाद ही सभा ने कहा कि वह बिश्‍नोई समाज से चंद्रमोहन को बाहर करती है। ये दूसरी बात है कि सभा के कई पदाधिकारियों के साथ चांद मोहम्‍मद के घनिष्‍ठ संबंध बने रहे। पक्षियों को सौ क्विंटल दाना चुगाने या गायों की सेवा करने से चंद्रमोहन का पाप नहीं धुल जाएगा और न ही समाज उन्‍हें अपनाएगा। भले ही कुछ तथाकथित धर्म और समाज के ठेकेदार कितना ही ढोंग रच लें।
इस पूरे प्रकरण पर चंद्रमोहन के पिता और पूर्व सीएम भजनलाल की मौन सहमति हैरान करने वाली है। भजन की छवि एक परंपरावादी व्‍यक्ति की रही है। सामाजिक मान्‍ताओं को तोडने के वे खिलाफ रहे हैं। बिश्‍नोई समाज के बडे तब‍के ने उनसे व्‍यक्ति की मौत के बाद किए जाने वाले भोज पर प्रतिबंध लगाने की मांग की, पर उन्‍होंने इसे एक परंपरा बताकर बंद करने का ऐलान करने से मना कर दिया। परंतु अब वे चांद मोहम्‍मद को चंद्रमोहन बनते चुपचाप देख रहे हैं, जबकि वे जानते हैं कि उसका अपराध अक्ष्‍मय है। उनकी सहमति के बिना रामानंद जैसे धर्मगुरु में इतनी हिम्‍मत नहीं की वह चांद मोहम्‍मद को बिश्‍नोई बनाने की बात सपने में भी सोच ले। लगता है बेटे के मोह में भजन भी अंधे हो चुके हैं। यह कहकर की वे कभी चंद्रमोहन से बात नहीं करेंगे, वे स्‍वयं को और समाज को धोखा दे रहे हैं।

Tuesday, July 28, 2009

समुद्र मंथन- दूसरे ग्रह से आए यान की क्रैश लैंडिंग की पहली कथा

समुद्र मंथन महज एक पौराणिक गल्प कथा नहीं है। समुद्र मंथन की कथा असल में अंतरक्षीय घटनाओं पर विमर्श की पहली दस्तावेजी घटना है। इसका वर्णन कुछ अतिश्योक्तिपूर्ण जरूर है। यह कथा स्कंद पुराण के माहेश्वर खंड में मिलती है। इसे पढ़ने पर जो संकेत मिलते हैं, उससे लगता है की किसी अन्य ग्रह से इंद्र आदि देवताओं के लिए रसद लेकर आया अंतरिक्षयान (मन्दराचल) पृथ्वी के वायुमंडल में खराब हो जाने के बाद अपने तय स्थान क्षीर सागर में नहीं उतर सका। इस यान का समुद्र में लाकर ही खोला जा सकता था। इसलिए इसे मिशन को नाम दिया गया समुद्र मंथन। उस समय दैत्य राज बलि ने इंद्र को पराजित कर समस्त संसाधनों पर कब्जा कर रखा था, ऐसे में बिना उनकी मदद से इस यान को वापस समुद्र में लाना संभव नहीं था। राक्षसों को मनाने के लिए इस मिशन के मूल तथ्यों को गुप्त रखा गया। (इस संबंध में विस्तार और वैग्यानिक नजरिए से स्कंद पुराण की कथा नए संदर्भ में इस ब्लॉग पर उपलब्ध है-
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Wednesday, July 8, 2009

बदल गया सावन

-सुधीर राघव

आज से सावन का महीना शुरू हो गया है। सावन का नाम सुनते ही ठंडी, लहराकर चलती तेज पुर्वाई का अहसास होता है और उमड़ते-घुमड़ते काले बादलों की तस्वीर उभरती है, जो कभी गरजते हैं और कभी मूसलाधार बरसते हैं। उनके आगे जेठ-भादों की तपती धूप की गर्मी छूमंतर हो जाती है। बागों में मोर नाचते हैं, कोयल की मधुर गूंज कभी अमराई से आती है तो कभी नीम के उस पेड़ से जिस पर छूले पड़ गए हैं। कवि के मन में भी हिलोरें उठने लगती हैं। नवविवाहिताएं मायके आ जाती हैं। आकाशवाणी दिल्ली से सावन के मधुर ब्रज गीत बजते हैं। सावन की यह तस्वीर लगता है पुरानी हो गई। जैसे-जैसे इन्सान बदला है सावन भी बदल गया है। यहां चंडीगढ़ में सावन का स्वागत चालीस डिग्री तक पहुंचा पारा कर रहा है। आसमान में बादल दूर-दूर तक नजर नहीं आ रहे। मोर और कोयल की बात करनी है तो छतबीड़ चिडियाघर का चक्कर लगा आइए। अब शहर ही नहीं गांवों में भी सावन के मायने इतने ही रह गए हैं। फसलों पर पेस्टीसाइट्स के अंधाधुंध इस्तेमाल ने मोर और कोयल छोड़े ही कहां। कुछ इक्का-दुक्का कहीं दिख जाते हैं। मोर मन का प्रतीक है, उसे कंकरीट के जंगल ऐसा आनंद नहीं दे सकते कि वह मगन हो कर नाचने लगे। उसे तो मानसून का छपछप राग चाहिए। बादलों की उमड़-घुमड़ और जमीन को छूकर चलती पुर्वाई। हम प्रकृति का दोहन कर रहे हैं। बदले में उसे क्या दे रहे हैं। यह कौन सोचे। ज्योतिषी चिल्ला रहे हैं कि इस सावन में तीन ग्रहण है। चंद्रग्रहण के साथ सावन शुरू हो रहा है, बीच में अमावस्या को सूर्यग्रहण और फिर अगली पूर्णिमा को चंद्रग्रहण। यह लक्षण कोई शुभ नहीं है। प्रकृतिक कोप देखने को मिल सकते हैं। ज्योतिषी का गणित मैं नहीं जानता, मगर इतना जरूर जानता हूं कि इस सावन को सचमुच कई ग्रहण लगे हैं। हमने अंधाधुंध पेड़ काटे हैं। मानसून तो भटकेगा ही। हमारे ऐसी, फ्रिज से निकले क्लोरो-फ्लोरो कार्बन ओजोन परत के लिए खतरा हैं। धरती लगातार गर्म हो रही है। ग्लेशियर पिघल रहे हैं। समुद्र तल बढ़ रहा है। अब इतना होगा तो सावन को तीन नहीं कई ग्रहण लगेगें। इसलिए सावन सूखा है। मौसम विभाग की आलोचना की जाती है कि वह मौसम को नहीं पकड़पाता उसकी भविष्यवाणी हमेशा फेल होती है। विभाग क्या करे। मानव निर्मित इतने कारक मौसम को प्रभावित करने लगे हैं कि उनका हिसाब-किताब लगाने के लिए वर्षों की रिसर्च चाहिए। पहले जब इनसान कुदरत के आगे दब कर रहता था, उसकी इज्जत करता था तो उसे कुदरत का अंदाजा भी रहता था। एक सामन्य बुद्धिवाला घाघ भड्डरी भी हमारे सेटेलाइट्स और संसाधन संपन्न मौसम विभाग से कहीं सटीक भविष्यवाणियां करता था। अब इन्सान ज्यादा घाघ है, पर घाघ बनकर फायदा क्या। उसका सावन तो सूखा है।