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Wednesday, July 8, 2009

बदल गया सावन

-सुधीर राघव

आज से सावन का महीना शुरू हो गया है। सावन का नाम सुनते ही ठंडी, लहराकर चलती तेज पुर्वाई का अहसास होता है और उमड़ते-घुमड़ते काले बादलों की तस्वीर उभरती है, जो कभी गरजते हैं और कभी मूसलाधार बरसते हैं। उनके आगे जेठ-भादों की तपती धूप की गर्मी छूमंतर हो जाती है। बागों में मोर नाचते हैं, कोयल की मधुर गूंज कभी अमराई से आती है तो कभी नीम के उस पेड़ से जिस पर छूले पड़ गए हैं। कवि के मन में भी हिलोरें उठने लगती हैं। नवविवाहिताएं मायके आ जाती हैं। आकाशवाणी दिल्ली से सावन के मधुर ब्रज गीत बजते हैं। सावन की यह तस्वीर लगता है पुरानी हो गई। जैसे-जैसे इन्सान बदला है सावन भी बदल गया है। यहां चंडीगढ़ में सावन का स्वागत चालीस डिग्री तक पहुंचा पारा कर रहा है। आसमान में बादल दूर-दूर तक नजर नहीं आ रहे। मोर और कोयल की बात करनी है तो छतबीड़ चिडियाघर का चक्कर लगा आइए। अब शहर ही नहीं गांवों में भी सावन के मायने इतने ही रह गए हैं। फसलों पर पेस्टीसाइट्स के अंधाधुंध इस्तेमाल ने मोर और कोयल छोड़े ही कहां। कुछ इक्का-दुक्का कहीं दिख जाते हैं। मोर मन का प्रतीक है, उसे कंकरीट के जंगल ऐसा आनंद नहीं दे सकते कि वह मगन हो कर नाचने लगे। उसे तो मानसून का छपछप राग चाहिए। बादलों की उमड़-घुमड़ और जमीन को छूकर चलती पुर्वाई। हम प्रकृति का दोहन कर रहे हैं। बदले में उसे क्या दे रहे हैं। यह कौन सोचे। ज्योतिषी चिल्ला रहे हैं कि इस सावन में तीन ग्रहण है। चंद्रग्रहण के साथ सावन शुरू हो रहा है, बीच में अमावस्या को सूर्यग्रहण और फिर अगली पूर्णिमा को चंद्रग्रहण। यह लक्षण कोई शुभ नहीं है। प्रकृतिक कोप देखने को मिल सकते हैं। ज्योतिषी का गणित मैं नहीं जानता, मगर इतना जरूर जानता हूं कि इस सावन को सचमुच कई ग्रहण लगे हैं। हमने अंधाधुंध पेड़ काटे हैं। मानसून तो भटकेगा ही। हमारे ऐसी, फ्रिज से निकले क्लोरो-फ्लोरो कार्बन ओजोन परत के लिए खतरा हैं। धरती लगातार गर्म हो रही है। ग्लेशियर पिघल रहे हैं। समुद्र तल बढ़ रहा है। अब इतना होगा तो सावन को तीन नहीं कई ग्रहण लगेगें। इसलिए सावन सूखा है। मौसम विभाग की आलोचना की जाती है कि वह मौसम को नहीं पकड़पाता उसकी भविष्यवाणी हमेशा फेल होती है। विभाग क्या करे। मानव निर्मित इतने कारक मौसम को प्रभावित करने लगे हैं कि उनका हिसाब-किताब लगाने के लिए वर्षों की रिसर्च चाहिए। पहले जब इनसान कुदरत के आगे दब कर रहता था, उसकी इज्जत करता था तो उसे कुदरत का अंदाजा भी रहता था। एक सामन्य बुद्धिवाला घाघ भड्डरी भी हमारे सेटेलाइट्स और संसाधन संपन्न मौसम विभाग से कहीं सटीक भविष्यवाणियां करता था। अब इन्सान ज्यादा घाघ है, पर घाघ बनकर फायदा क्या। उसका सावन तो सूखा है।

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