रूलीराम बिश्नोई
देश का पेट भरने वाला एक और किसान दुनिया से विदा हो गया। उसकी मौत का जिम्मेदार कोई साहुकार या निजी कंपनी नहीं बल्कि सरकार है। हरियाणा के गोरखपुर का रहने वाला भागूराम अपने अन्य साथियों के साथ अपनी जमीन बचाने की लड़ाई करीब पांच महीने से लड़ रहा था। न्यूक्लियर पावर प्लांट के लिए हरियाणा सरकार गोरखपुर व कुम्हारिया गांव की जमीन का अधिग्रहण कर रही है। किसान जमीन अधिग्रहण के खिलाफ हैं। हरियाणा के मुख्यमंत्री से लेकर कांग्रेस के युवराज राहुल तक वो अपनी व्यथा सुना आए थे पर सिवाय आश्वासन के भागूराम को कुछ नहीं मिला। उसकी इस लड़ाई में न तो कोई राजनीतिक दल साथ था और न ही मीडिया। मीडिया के लिए उनका धरना बस ब्रीफ में लगाने लायक ही खबर थी। हरियाणा के मुख्यमंत्री को भागूराम की भला क्यों परवाह होती। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया और राहुल तक हरियाणा सरकार की जमीन अधिग्रहण नीति को जायज जो ठहरा चुके थे। कांग्रेसी मुख्यमंत्री के लिए जनता से ज्यादा हाईकमान का खुश होना मायने रखता है, जनता का नहीं।
किसानों के धरने को जिला प्रशासन ने तब तक गंभीरता से नहीं लिया जब तक की भागूराम की मौत नहीं हो गई। धरने पर कुछ ही किसान बैठे थे और वे हिंसक नहीं थे। तो फिर सरकार क्यों परवाह करती। और उसने परवाह की भी नहीं। बस दो टूक जवाब दिया, जमीन तो देनी ही होगी। सरकार के किसी भी नुमाइंदे ने आकर ढंग से बात भी नहीं की। अगर बात की होती तो शायद नौबत भागूराम की मौत की न आती। हां, सरकार ने राजनीति जरूर खेली। कुछ कांग्रेसी कार्यकर्ताओं से ये बयान दिलवाए की वो अपनी जमीन सरकार को देने को तैयार हैं। सरकार सही रेट दे रही है। जो किसान धरने पर बैठे हैं वो विरोधी राजनीतिक दलों के बहकावे में हैं। जबकि हकीकत यह थी कि जो किसान अपनी जमीनें देने की बात कह रहे थे उनमें से बहुतों की जमीन तो उस क्षेत्र में पड़ती ही नहीं जहां पावर प्लांट बनना है। कुछ की बहुत थोड़ी भूमि उस हद में आती थी जहां प्लांट प्रस्तावित है। ऐसे लोगों को गांव छोड़कर जाने की नौबत नहीं आने वाली। दूसरी ओर जो किसान अधिग्रहण के विरोध में हैं उनकी सारी जमीन अधिग्रहित होनी है। अगर उनकी जमीन अधिग्रहित कर ली जाती है तो उन्हें कहीं और जाकर बसना पड़ेगा। यही वजह है कि वो इसके खिलाफ हैं।
कहां मिलेगी ऐसी जमीन
जिस जमीन का अधिग्रहण होना है वह अब बेहद उपजाऊ है। इसके दो तरफ नहरें हैं। नहरी पानी भी पूरा है। नहरें होने की वजह से भूमिगत पानी भी मीठा है। पचास फीट गहराई पर ही टयूबवैल लगाया जा सकता है। जमीन ऐसे है की इसमें गेहूं, चावल, कपास, नरमा, ग्वार, बाजरा तो उगाया ही जा सकता है साथ ही यह बेल वाली सब्जियों के लिए बहुत अच्छी है। इस जमीन का एक साल का ठेका ही करीब 30 हजार रूपए प्रति एकड़ है। अगर इसमें गेहूं और धान लगाया जाए तो एक किसान साल में औसतन प्रति एकड़ 50 हजार रूपए कमा लेता है।
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