महंगाई की मार दिनोंदिन तीखी होती जा रही है। ऐसे लगता है कि देश व्यापारियों के रहमोकरम पर है। सरकार नपुंसक हो चुकी है। गेहूं बिजाई के सीजन में इस बार हरियाणा में जिस तरह से बीज की किल्लत हुई है, उससे तो लगता है कि जैसे सरकार के लिए किसान और खेती सौतेले हो गए हैं। किसानों को गेहूं के अच्छे बीज सरकारी दुकानों पर मिले ही नहीं। व्यापारियों ने मनमाने रेटों पर घटिया बीज बेचे। अब जब गेहूं को यूरिया की सख्त जरूरत है तो हरियाणा के गेहूं उत्पादन करने वाले जिलों में यह खाद भी मुश्किल से मिल रही है। बढिया बीजों और खाद के बिना खेत अच्छी फसल नहीं दे सकते। यह बात सभी जानते हैं पर हमारी सरकार चलाने वालों की समझ यह तथ्य नहीं आ रहा है। इससे अगर गेहूं का उत्पादन गिरेगा तो सरकार गेहूं के दाम बढने से कैसे रोकेगी यह बात समझ से परे है।
यह इस साल की ही बात नहीं है। बीजाई सीजन में डीएपी खाद की कमी होना तो अब आम बात हो चुकी है। इस बार भी डीएपी मुश्किल से मिली थी। अब यूरिया की कमी कोढ में खाज का काम कर रही है। जब खाद की किल्लत होती है तो नकली खाद बाजार में पहुंच जाती है। नकली खाद की पहचान आसानी से नहीं की जा सकती। मजबूरी में किसान व्यापारियों से खाद खरीदते हैं। नकली खाद फसल के किसी काम की नहीं होती। डीएपी नकली हो तो गेहूं का उगाव ही बहुत कमजोर हो जाता है। और अगर यूरिया भी समय पर फसल को न मिले तो पैदावार 75 फीसदी तक गिर जाती है। इस पर बीज भी घटिया हो तो समझो किसान डूब गया।
अगर गेहूं के कुल बीजाई क्षेत्र के 20 फीसदी हिस्से में ही नकली बीज या खाद का प्रयोग हो जाए तो कुल उत्पादन पर कितना बुरा असर पड़ेगा, इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।
इसलिए अगर सरकार को महंगाई पर काबू पाना है तो उसे हर फसल की पैदावार बढ़ाने की और ध्यान देना होगा। पैदावार बढ़ाने का सबसे अच्छा तरीका है उन्नत बीज और खाद। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा की ये पर्याप्त मात्रा में किसान को मिले। अगर सरकार ऐसा नहीं कर सकती तो महंगाई पर वो काबू इस साल तो क्या कभी भी नहीं पा सकेगी।
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